Wednesday, 23 May 2012

गूँज



मैशाला के द्वार पर
दो अजनबी खड़ें हैं,
एक शमा की जाल  में
धीरे - धीरे घुल  रहें हैं,

टूटे बिखरे कांच पे
हलके से आगे बढ रहें हैं ।
उस शमा की आंच से,
ज़रा ज़रा सा लड़ रहें हैं ।

प्यालों की गूँज में जो ये 
धीमे से बातें हो रहीं हैं,
साकी पहचाना, जान कर,
नई शुरुआतें हो रहीं हैं ।

दो अजनबी रात भर यूहीं,
खोते गए भूली बातों में,
राहें कभी मिली नहीं, 
अब मिलतें हैं अक्सर खवाबों में ।

No comments:

Post a Comment