दो अजनबी खड़ें हैं,
एक शमा की जाल में
धीरे - धीरे घुल रहें हैं,
टूटे बिखरे कांच पे
हलके से आगे बढ रहें हैं ।
उस शमा की आंच से,
ज़रा ज़रा सा लड़ रहें हैं ।
प्यालों की गूँज में जो ये
धीमे से बातें हो रहीं हैं,
साकी पहचाना, जान कर,
नई शुरुआतें हो रहीं हैं ।
दो अजनबी रात भर यूहीं,
खोते गए भूली बातों में,
राहें कभी मिली नहीं,
अब मिलतें हैं अक्सर खवाबों में ।

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