Thursday, 29 March 2012

ओस


भाग कर थके हुए,
चादर से ढके हुए,
नींद के द्वार पर
काटों से फंसे हुए,

ओस से धोए हुए,
धुएं से खोए हुए,
मोम से पिघलकर
रात भर रोए हुए,


मन के सवालों को,
धुंधला सा करे हुए,
मेरे बिखरे बालों में,
आंसू ये बुने हुए ।

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