ग़ज़ल के किनारे
एक गीत छुपा है ,
न जाने मेरे सुरों से
वो क्यों खफा है,
उसको धुन भी पता है,
सरगम से भी वो वाकिफ है,
उसके शब्दों की गुफ्तगू भी,
इस धड़कन से वाकिफ है,
पर ज़रा थका सा ये कारवां है,
ज़रा थमा सा ये जहां है,
उभरता सितारा क्यों
दिन में फंसा है?
गीत ये हसीं, लबों से
क्यों गुस्सा है?
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