Tuesday, 10 April 2012

खामोशी



मैं और मेरी खामोशी,
काफी पुराने दोस्त हैं,
आम सी दोस्ती है
मिलतें हैं, झगड़तें हैं,

कभी कभी हिचकिचाकर,
चुपके से बातें करतें हैं,
कभी चिल्लाकर,
रातों में गुस्सा करतें हैं,

कभी संग यूं उड़ते हैं,
कि भीड़ों से उभर जाएं,
कभी ऐसे बिखरतें हैं,
जानी गलियों में भटक जाएं ।

पर साथ हो जब आपका,
वो मुझसे कुछ खफा रहती थी।
हर बार इसी मोड़ पर,
मुझसे वो अलविदा कहती थी।

आज इसी मोड़ पर,
अजूबी सी बात हुई,
आखिर डर-डर कर,
आप दोनों की मुलाकात हुई,

अब कभी कभी हमारे बीच,
ख़ामोशी आकर रहती है ।
लम्बे दिनों की लम्बी शामों में ,
हमें चुप्पी की चादर से ढकती  है ।

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