Friday, 13 April 2012

अंगड़ाई


अंगड़ाई आज फिर से
जगाने आई है,
सपनो की मंजिलें फिर से 
गुमाने आई है,

आगे..
लाख गलियाँ हैं तो
लाख गलतियाँ भी हैं,
मेरी आज़ादियाँ हैं तो
तनहाइयाँ भी हैं,

बुझदिल सा ये जाल
फिर किसने बिछाया है ।
ललकारता सा आज क्यूँ
फिर सवेरा आया है ।

Wednesday, 11 April 2012

गीत


ग़ज़ल के किनारे
एक गीत छुपा है ,
न जाने मेरे सुरों से
वो क्यों खफा है,

उसको धुन भी पता है,
सरगम से भी वो वाकिफ है,
उसके शब्दों की गुफ्तगू भी,
इस धड़कन से वाकिफ है,

पर ज़रा थका सा ये कारवां है,
ज़रा थमा सा ये जहां है,

उभरता सितारा क्यों 
दिन में फंसा है?
गीत ये हसीं, लबों से
क्यों गुस्सा है?

Tuesday, 10 April 2012

खामोशी



मैं और मेरी खामोशी,
काफी पुराने दोस्त हैं,
आम सी दोस्ती है
मिलतें हैं, झगड़तें हैं,

कभी कभी हिचकिचाकर,
चुपके से बातें करतें हैं,
कभी चिल्लाकर,
रातों में गुस्सा करतें हैं,

कभी संग यूं उड़ते हैं,
कि भीड़ों से उभर जाएं,
कभी ऐसे बिखरतें हैं,
जानी गलियों में भटक जाएं ।

पर साथ हो जब आपका,
वो मुझसे कुछ खफा रहती थी।
हर बार इसी मोड़ पर,
मुझसे वो अलविदा कहती थी।

आज इसी मोड़ पर,
अजूबी सी बात हुई,
आखिर डर-डर कर,
आप दोनों की मुलाकात हुई,

अब कभी कभी हमारे बीच,
ख़ामोशी आकर रहती है ।
लम्बे दिनों की लम्बी शामों में ,
हमें चुप्पी की चादर से ढकती  है ।