मुलाकात
अन्सोई रातों से,
अनकही बातों से,
उलझे बालों से,
गीले गालों से,
जाने कितने सालों से,
अकेले बैठें हैं,
गुमसुम यूं ऐठें हैं,
कबसे थमी नज़र,
पर न कोई खबर.
भीगे से ख़त से,
सूनी सी छत से,
दबी सी आशा हैं ,
नैनों की भाषा हैं ,
कबसे तलाशा हैं..
तुम यूं न खोते तो,
तन्हा न होते तो,
सावन बरसता,
दिन फिर सँवरता,
चंदा निखरता .|
No comments:
Post a Comment