Friday, 24 February 2012


मुलाकात


अन्सोई रातों से,
अनकही बातों से,
उलझे बालों से,
गीले गालों से,
जाने कितने सालों से,
       
अकेले बैठें हैं,
गुमसुम यूं  ऐठें हैं,
कबसे थमी नज़र,
पर न कोई खबर.
        

भीगे से ख़त से,
सूनी सी छत से,
दबी सी आशा हैं ,
नैनों की भाषा हैं ,
कबसे तलाशा हैं..

तुम यूं न खोते तो,
तन्हा न होते तो,
सावन बरसता, 
दिन फिर सँवरता,
चंदा निखरता .|

उस ओर




बंद डब्बों में क्या पड़ा है,
कौन जानता है,
उस ओर कौन खड़ा है,
कौन जानता है ।

क्या पता हम सहीं हैं
या हैं गलत |

क्या पता आगे गली है
या है सरहद |

धड़कन है इन शब्दोँ में
कि वो भी लापता हैं,
या इन चुप रातों में,
वो भी खुशनुमा हैं |

बस ज़िन्दगी समेट
ये बंदा आगे बढा है,
क्या पता उस ओर
कौन खड़ा है |

Thursday, 23 February 2012

The Rickety Rack

A blog that covers a range of subjects from poetry to tech; from movies and photography to science; with a special interest for Mumbai, India.